पेट्रोल-डीजल सुरक्षित, फिर LPG कैसे हो गई ‘आउट ऑफ स्टॉक’? मिडिल ईस्ट तनाव और हॉर्मुज संकट की पूरी कहानी |

By Pooja Mehta

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जब भी मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता है, पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ जाती है। इसका सबसे बड़ा कारण ओमान और ईरान के बीच स्थित हॉर्मुज जलडमरूमध्य है। यह समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बेहद महत्वपूर्ण रास्ता माना जाता है। दुनिया के तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। इसलिए जब भी यहां तनाव या रुकावट की खबर आती है, लोगों को लगता है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें तेजी से बढ़ जाएंगी।

एलपीजी पर क्यों पड़ता है सबसे तेज असर

हालिया घटनाओं और ऊर्जा आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि ऐसे संकटों में सबसे ज्यादा और सबसे तेज असर एलपीजी यानी रसोई गैस पर पड़ता है। इसका मुख्य कारण भारत की एलपीजी आयात पर भारी निर्भरता है। देश में हर साल करीब 3 करोड़ टन से ज्यादा एलपीजी की खपत होती है, लेकिन घरेलू उत्पादन इसकी पूरी जरूरत को पूरा नहीं कर पाता। इसलिए बड़ी मात्रा में गैस खाड़ी देशों से मंगाई जाती है।

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इन आयातित गैस टैंकरों का लगभग 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर भारत तक पहुंचता है। जब इस मार्ग पर किसी प्रकार का खतरा या बाधा पैदा होती है तो एलपीजी टैंकरों की आवाजाही रुक जाती है। नतीजा यह होता है कि गैस की आपूर्ति अचानक कम हो जाती है और इसका असर सबसे पहले घरेलू उपभोक्ताओं और होटल-रेस्टोरेंट जैसे व्यवसायों पर दिखने लगता है।

पेट्रोल और डीजल क्यों नहीं होते तुरंत प्रभावित

कच्चे तेल से पेट्रोल और डीजल बनते हैं, लेकिन इन ईंधनों की आपूर्ति व्यवस्था एलपीजी से काफी अलग है। भारत कई देशों से कच्चा तेल खरीदता है, जिनमें रूस, इराक और सऊदी अरब प्रमुख हैं। इनमें से कुछ तेल ऐसे समुद्री रास्तों से आता है जो हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर नहीं हैं। इसलिए यदि एक रास्ते में समस्या आती है तो अन्य स्रोतों से आपूर्ति जारी रह सकती है।

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इसके अलावा भारत के पास कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार भी मौजूद है। विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पाडुर जैसे स्थानों पर भूमिगत गुफाओं में तेल जमा रखा जाता है ताकि आपातकालीन स्थिति में कई हफ्तों तक जरूरत पूरी की जा सके। यही कारण है कि हॉर्मुज संकट का असर पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता पर तुरंत नहीं दिखता।

एलपीजी भंडारण की सीमाएं

एलपीजी को बड़े पैमाने पर लंबे समय तक सुरक्षित रखना तकनीकी रूप से मुश्किल और महंगा होता है। इसे तरल अवस्था में रखने के लिए विशेष दबाव या अत्यधिक ठंडे तापमान की जरूरत होती है। इसी वजह से भारत में एलपीजी का बड़ा राष्ट्रीय भंडार मौजूद नहीं है। उपलब्ध भंडारण क्षमता बहुत सीमित है, जो देश की मांग के मुकाबले बेहद कम मानी जाती है।

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बढ़ती मांग और नई चुनौती

पिछले कुछ वर्षों में रसोई गैस की मांग तेजी से बढ़ी है। उज्ज्वला योजना जैसी सरकारी योजनाओं के कारण करोड़ों नए परिवार एलपीजी से जुड़े हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ ईंधन का उपयोग बढ़ा है, लेकिन साथ ही देश की आयात निर्भरता भी बढ़ गई है। ऐसे में वैश्विक आपूर्ति में थोड़ी सी भी रुकावट सीधे घरेलू रसोई तक असर पहुंचा सकती है।

डिस्क्लेमर:

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यह लेख विभिन्न सार्वजनिक रिपोर्टों और उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार किया गया विश्लेषणात्मक लेख है। इसमें दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल सामान्य समझ प्रदान करना है, इसे अंतिम या आधिकारिक ऊर्जा नीति का बयान नहीं माना जाना चाहिए।

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